Real Estate Cases Under Insolvency and Bankruptcy Code Declined By 50 Percent | IBC के तहत रियल इस्टेट की कंपनियों की संख्या में आई 50% की गिरावट

Published by Razak Mohammad on

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मुंबई14 मिनट पहले

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IBC के आंकड़ों से पता चला है कि 30 सितंबर, 2020 तक IBC के तहत रिजॉल्यूशन के लिए दाखिल रियल इस्टेट, रेंटिंग और बिजनेस एक्टिविटीज में ऐसी कंपनियों की संख्या 793 थी। इसमें से 398 बंद हो चुकी हैं। 395 अब भी अपना कामकाज कर रही हैं

  • एक दिसंबर 2016 को कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस ((CIRP) को लांच किया गया था। इसमें अलग-अलग सेक्टर्स से कुल 4,008 कंपनियां गई थीं
  • इसमें से 473 केस अपील के स्टेज पर ही बंद हो गईं या उनका सेटल हो गया। 291 केस वापस ले ली गई। 1,025 केस लिक्विडेशन में गई

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) के तहत रिजॉल्यूशन के दौर से गुजर रही रियल इस्टेट और इससे संबंधित कंपनियों की संख्या में पिछले साल करीब 50% की गिरावट आई है। दिवालियापन कानून की शुरुआत के बाद दिवालिया हुई ज्यादातर कंपनियां रियल इस्टेट से ही संबंधित हैं। ऐसे में गिरावट का यह आंकड़ा काफी मायने रखता है।

रियल इस्टेट की कुल 793 कंपनियां

IBC के आंकड़ों से पता चला है कि 30 सितंबर, 2020 तक IBC के तहत रिजॉल्यूशन के लिए दाखिल रियल इस्टेट, रेंटिंग और बिजनेस एक्टिविटीज में ऐसी कंपनियों की संख्या 793 थी। इसमें से 398 बंद हो चुकी हैं। 395 अब भी अपना कामकाज कर रही हैं। बंद कंपनियों में से 34 मामलों का समाधान कर दिया गया है। 123 का सेटलमेंट किया जा चुका है। 166 कंपनियां लिक्विडेशन के लिए गई हैं। साथ ही आईबीसी की धारा 12 ए के तहत 75 मामले वापस ले लिए गए हैं।

रेरा और आईबीसी नया युग लाए हैं

विश्लेषकों के मुताबिक रेरा के साथ आईबीसी भारतीय रियल इस्टेट क्षेत्र के लिए रेगुलेशन के लिए एक नया युग लाया है। इन दोनों सुधारों ने घर खरीदने वालों को मदद किया है। इससे उन्हें न्याय पाने के लिए एक सही प्लेटफॉर्म मिल गया है। घर खरीदार अब रेरा के तहत उपभोक्ता अदालतों में मामला दर्ज कर सकते हैं। आईबीसी की वजह से नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के समक्ष दावा दायर कर सकते हैं।

एनबीएफसी के लिए गंभीर लिक्विडिटी का संकट

साल 2018 की दूसरी छमाही में NBFC की समस्या ने डेवलपर्स के लिए एक गंभीर लिक्विडिटी का संकट पैदा कर उनकी मुसीबतों में और इजाफ़ा कर दिया था। इस प्रकार आईबीसी वित्तीय विफलता और दिवाला के मामलों पर निर्णय देने के लिए एक कानूनी फ्रेमवर्क स्थापित करने की दिशा में अच्छा कदम साबित हुआ है।

रेसिडेंशियल रियल इस्टेट की बढ़ी है दिक्कत

दरअसल हाल में रेसिडेंशियल रियल इस्टेट सबसे ज्यादा पिटा है। 2019 के अंत तक 5.6 लाख यूनिट्स देश में थीं। इसकी कुल वैल्यू 4.64 लाख करोड़ रुपए थी। हालांकि इसमें ज्यादातर प्रोजेक्ट को 7 बड़े शहरों में पूरा करने में देरी हुई। बता दें कि एक दिसंबर 2016 को कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस ((CIRP) को लांच किया गया था। इसमें अलग-अलग सेक्टर्स से कुल 4,008 कंपनियां गई थीं। इसमें से 473 केस अपील के स्टेज पर ही बंद हो गईं या उनका सेटल हो गया। 291 केस वापस ले ली गई। 1,025 केस लिक्विडेशन में गई। इस समय 1,942 CIRP अभी भी लंबित हैं।

4 सालों में तेजी से बढ़ा है मामला

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 4 सालों में इस केस में तेजी से बढ़त हुई है। 4008 केस में रियल इस्टेट का हिस्सा करीबन 20 पर्सेंट है। यानी 793 केस हैं। इसमें से करीबन 50 पर्सेंट यानी 398 केस बंद हो चुके हैं। 395 अभी भी लंबित हैं। आंकड़े बताते हैं कि जुलाई-सितंबर 2018 में कुल 209 केस में 68 केस बंद हुई थी। 2019 में इसी अवधि में 500 में से 201 केस बंद हुई थी।

आईबीसी मोदी सरकार के सबसे बड़े सुधारों में से एक था। IBC के अनुसार, किसी कंपनी ने कर्ज लिया है और वह दिवालिया हो गई तो उसकी संपत्तियों को बैंक या कर्ज देने वाला अपने कब्जे में ले सकता है। हालांकि इसके लिए एक निश्चित प्रक्रिया को पूरा करना होता है।

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