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समस्तीपुर के कर्पूरी ठाकुर दो बार बने बिहार के मुख्‍यमंत्री, एक बार भी नहीं पूरा कर पाए कार्यकाल; फैसले ही ऐसे लिए कि…

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बिहार की राजनीति में नेता तो ढेरों आए और गए, लेकिन कर्पूरी ठाकुर इन चुनिंदा चेहरों में शामिल हैं, जिनका भूलना निकट भविष्‍य में संभव नहीं दिखता। बिहार और पूरे उत्‍तर भारत की राजनीति में पिछड़ों के उभार की शुरुआत का वे एक प्रतीक हैं।

जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर उनके पुत्र और समस्तीपुर से जदयू के राज्यसभा सदस्य रामनाथ ठाकुर ने उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि- वस्तुत: वह एक दूरदर्शी राजनेता थे। व्यक्तिगत मान-अपमान की चिंता किए बगैर वे वंचित तबकों के हित के लिए कोई भी जोखिम उठाने को तैयार रहते थे।

रामनाथ ठाकुर ने कहा कि कर्पूरी जी ने हमेशा सामाजिक मुद्दों को अपने एजेंडे में आगे रखा और शालीनतापूर्वक उसे विमर्श के केंद्र में ला दिया। इसके लिए उन्होंने अपने संसदीय और विधायी दायित्व का सर्वाधिक उपयोग किया। गरीब जनता के सवाल को सदन में वह दृढ़तापूर्वक उठाते थे और उसे निष्कर्ष पर ले जाते थे।

उन्होंने बताया कि सदन की कार्यवाही में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब कमजोर तबकों पर हो रहे जुल्म और अत्याचार की घटनाओं को लेकर कर्पूरी ठाकुर ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। उनका मानना था कि दलित, पिछड़े व अन्य वंचित समाज की गरीबी और उनके पिछड़ेपन का कारण केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है।

इन्हें विशेष अवसर देने की बात डा. लोहिया ने कही थी। लेकिन विशेष अवसर तो दूर, भारत के संविधान में जो समानता का अधिकार है, इससे भी ये लोग वंचित हैं।

 बिहार

कर्पूरी ठाकुर ने विधानसभा में 23 अगस्त 1973 को राज्य में दलित, पिछड़े एवं आदिवासी समाज की समस्याओं पर हुए विवाद में कहा था कि- यह निर्विवाद है कि हरिजन, आदिवासी और पिछड़े लोग आर्थिक दृष्टि से अत्यंत शोषित हैं, सामाजिक दृष्टि से अपमानित और लांछित हैं। शैक्षणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से तो सर्वाधिक उपेक्षित हैं। स्वभावत: आर्थिक और सामाजिक कारणों से प्रशासनिक पक्षपात से ये वर्ग प्रतिदिन अन्याय और अत्याचार के शिकार होते हैं।

रामनाथ बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर को इस बात की सबसे अधिक पीड़ा थी कि आजादी के इतने दिनों बाद भी आर्थिक विषमता और सामाजिक गैर बराबरी की खाई बढ़ती गयी है। जन्म के आधार पर जाति की सर्वोच्चता का प्रहार दलित, पिछड़े और गरीब-वंचित समुदाय झेलते रहे हैं। जड़ मानसिकता और दंभ के खिलाफ जीवन भर उन्होंने संघर्ष किया। उनका मानना था कि दलितों, पिछड़ों और वंचितों के शोषण-उत्पीडऩ के मूल में समाज की दकियानूसी और प्रतिक्रियावादी ताकतें सक्रिय रही हैं।

इतिहास ने उन्हें दो बार मुख्यमंत्री बनने का भी अवसर दिया। किंतु विडंबना रही कि वे अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। वर्ष 1977 में जब वह दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए मुंगेरी लाल आयोग की अनुशंसा लागू कर आरक्षण का रास्ता खोल दिया। उन्हें अपनी सरकार की कुर्बानी देनी पड़ी, लेकिन जननायक अपने संकल्प से विचलित नहीं हुए।

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