हिमाचल: 40 रुपये किलो खरीदे सेब को 250 रुपये किलो बेच रही हैं प्राइवेट कंपनियां

Published by Razak Mohammad on

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किसान आंदोलन के समर्थन में सेब खरीदने वाली निजी कंपनियों के खिलाफ इन दिनों सोशल मीडिया पर बागवान जमकर नाराजगी जता रहे हैं। सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि 40 रुपये किलो सेब खरीद कर निजी कंपनियां अब मैट्रो सिटी के रिटेल मार्ट में 250 रुपए किलो बेच रही है। निजी कंपनियों द्वारा बागवानों का सेब करीब 6 गुना मुनाफे पर बेचने से बागवान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।

बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के पूर्व वाइस चांसलर विजय सिंह ठाकुर ने अपनी सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा है कि बागवानों से 40 रुपये प्रति किलो खरीदा गया सेब कोलकाता के रिटेल मार्ट में 250 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। 60 फ़ीसदी रंग वाले इस सेब का सीजन के दौरान कंपनी ने 40 रुपये दाम निर्धारित किया था। प्राइवेट कंपनियां भविष्य में हमारे लिए विदेशी सेब से भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं।

यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ठियोग मतियाना के रहने वाले ठाकुर सुरेंद्र सिंह दादा ठाकुर का कहना है कि पंजाब के किसानों की तरह हिमाचल के बागवानों को एमएसपी के लिए बहुत पहले आंदोलन में उतर जाना चाहता चाहिए था। सेब खरीदने वाली कंपनियां बागवानों का शोषण कर रही है। कंपनियां मार्केट में जैसे ही अपने रेट खोलती है मंडियों में सेब के दाम गिर जाते हैं। इस सेब सीजन में भी ऐसा ही हुआ।

हिमाचल प्रदेश किसान संघर्ष समिति के सचिव संजय चौहान लिखते हैं कि किसानों से 40, 50 रुपये किलो खरीदा गया सेब जब कंपनी के हाथ लगता है तो उसकी कीमत 250 रुपये हो जाती है। पूरी साल मेहनत करने वाले किसान को लागत भी नहीं मिलती। सरकार की गलत नीतियों के कारण निजी कंपनियां 4 से 5 गुना तक मुनाफा कमाती है। स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार खरीद मूल्य तय करने के लिए आंदोलन चल रहा है। जिससे किसान को लाभकारी मूल्य मिलेगा और उपभोक्ता को आधे से कम दाम पर कृषि उत्पाद मिलेंगे।

उधर सेब खरीद करने वाली नामी कंपनी के प्रतिनिधि का दावा है कि सीजन के दौरान खरीदा गया सेब खर्चा काटकर 2 रुपये घाटे में बेचना पड़ रहा है। 250 रुपये किलो सेब बेचने का दावा सही नहीं है। कंपनियां घाटे में हैं, इसलिए कई कंपनियां बंद हो गई है और जो काम कर रही है वह भी अपने कारोबार को बढ़ा नहीं दे पा रही।

किसान आंदोलन के समर्थन में सेब खरीदने वाली निजी कंपनियों के खिलाफ इन दिनों सोशल मीडिया पर बागवान जमकर नाराजगी जता रहे हैं। सोशल मीडिया में दावा किया जा रहा है कि 40 रुपये किलो सेब खरीद कर निजी कंपनियां अब मैट्रो सिटी के रिटेल मार्ट में 250 रुपए किलो बेच रही है। निजी कंपनियों द्वारा बागवानों का सेब करीब 6 गुना मुनाफे पर बेचने से बागवान खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।

बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के पूर्व वाइस चांसलर विजय सिंह ठाकुर ने अपनी सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा है कि बागवानों से 40 रुपये प्रति किलो खरीदा गया सेब कोलकाता के रिटेल मार्ट में 250 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। 60 फ़ीसदी रंग वाले इस सेब का सीजन के दौरान कंपनी ने 40 रुपये दाम निर्धारित किया था। प्राइवेट कंपनियां भविष्य में हमारे लिए विदेशी सेब से भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं।

यंग एंड यूनाइटेड ग्रोवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ठियोग मतियाना के रहने वाले ठाकुर सुरेंद्र सिंह दादा ठाकुर का कहना है कि पंजाब के किसानों की तरह हिमाचल के बागवानों को एमएसपी के लिए बहुत पहले आंदोलन में उतर जाना चाहता चाहिए था। सेब खरीदने वाली कंपनियां बागवानों का शोषण कर रही है। कंपनियां मार्केट में जैसे ही अपने रेट खोलती है मंडियों में सेब के दाम गिर जाते हैं। इस सेब सीजन में भी ऐसा ही हुआ।

हिमाचल प्रदेश किसान संघर्ष समिति के सचिव संजय चौहान लिखते हैं कि किसानों से 40, 50 रुपये किलो खरीदा गया सेब जब कंपनी के हाथ लगता है तो उसकी कीमत 250 रुपये हो जाती है। पूरी साल मेहनत करने वाले किसान को लागत भी नहीं मिलती। सरकार की गलत नीतियों के कारण निजी कंपनियां 4 से 5 गुना तक मुनाफा कमाती है। स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार खरीद मूल्य तय करने के लिए आंदोलन चल रहा है। जिससे किसान को लाभकारी मूल्य मिलेगा और उपभोक्ता को आधे से कम दाम पर कृषि उत्पाद मिलेंगे।

उधर सेब खरीद करने वाली नामी कंपनी के प्रतिनिधि का दावा है कि सीजन के दौरान खरीदा गया सेब खर्चा काटकर 2 रुपये घाटे में बेचना पड़ रहा है। 250 रुपये किलो सेब बेचने का दावा सही नहीं है। कंपनियां घाटे में हैं, इसलिए कई कंपनियां बंद हो गई है और जो काम कर रही है वह भी अपने कारोबार को बढ़ा नहीं दे पा रही।

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