#हिंदीहैंहम: हिंदी भाषा में लाना होगा संस्कृत की तरह आकर्षण, तभी रुचि लेगा हर कोई

Published by Razak Mohammad on

अमर उजाला के शिमला कार्यालय से शनिवार को हिंदी हैं अभियान के तहत एक वेबिनार का आयोजन किया गया। इसमें लेखक, कवि, कलाकार, शिक्षक, कर्मचारी, विद्यार्थी, सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी जैसे तमाम वर्गों के प्रतिनिधि बुद्धिजीवियों से संवाद किया गया। सबने बेबाकी से अपनी राय रखी। वेबिनार में हुए संवाद के अंश :   

हिंदी को अछूते क्षितिजों को स्पर्श करना होगा : प्रो मेहता

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सांध्यकालीन अध्ययन केंद्र के हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त और कई पुस्तकों के लेखक प्रोफेसर रामनाथ मेहता ने कहा कि हिंदी भाषा ने अपने को अनंत रूपों में अभिव्यक्ति दी है। उसमें कई कालजयी रचनाएं हैं। आज के संदर्भ में ज्ञान, विज्ञान जैसे आईटी, बायोटेक्नोलॉजी का जमाना है तो हिंदी को उन अछूते क्षितिजों को भी स्पर्श करना है, वरना हिंदी भाषा को कोई क्यों पढ़ेगा? हिंदी भाषा में आकर्षण लाना होगा, जैसे संस्कृत में बना हुआ है। इसके लिए पाणिनि, सुश्रुत, चरक आदि चाहिए। हिंदी भाषा को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से संबंधी मौलिक सृजनात्मक साहित्य की ओर उन्मुख होना चाहिए। 

व्यवहारिक हिंदी को ही प्राथमिकता दें : डॉ. राकेश

हिपा शिमला में अर्थशास्त्र के सह आचार्य डॉ. राकेश शर्मा ने कहा कि हिंदी भाषा भारतवर्ष में उन प्रांतों को भी अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा आसानी से जोड़ती है, जहां अलग-अलग स्थानीय मातृभाषाएं हैं। असंख्य बोलियों के प्रदेश हिमाचल में हम हिंदी को मातृभाषा समान ही उपयोग में ला रहे हैं, इसलिए आवश्यकता है कि लिखने और बोलने के विभिन्न मंचों पर व्यवहारिक हिंदी को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

हिंदी के ज्ञाता ही इस भाषा की अवहेलना कर रहे : ओम 

कवि और कथाकार ओम भारद्वाज ने कहा कि हिंदी के ज्ञाता ही इस भाषा की अवहेलना कर रहे हैं। इसका प्रमाण यहां से मिलता है कि हिंदी प्राध्यापकों के बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ते हैं। हम अंग्रेजी को मजबूरन सिर पर लादे हैं। व्यवस्था में अंग्रेजी का महत्व इतना है कि उसके बगैर हम अधूरे दिखते हैं। ओम की दो किताबें बर्फ हुआ आदमी और चांदी का रुपया चर्चा में हैं। 

प्राण के बगैर शरीर किसी काम का नहीं होता : कल्पना

लेखिका और एफएम शिमला में उद्घोषिका कल्पना गांगटा ने कहा है कि राष्ट्रभाषा एकता के सूत्र में बांधती है। इसमें वह सारे गुण और विशेषताएं हैं जो राष्ट्र भाषा में चाहिए। शब्द भंडार में एक ही शब्द के कई पर्यायवाची बन जाते हैं। जिस तरह से प्राण के बगैर शरीर किसी काम का नहीं होता है। भाषा एवं संस्कृति के लुप्त पर राष्ट्र पंगु हो जाएगा। अंग्रेजी भाषा हम पर आज भी महारानी बनकर राज कर रही है, जबकि निज भाषा ही उन्नति का मूल है।

अपनी भाषा को ही छोड़ दिया तो यह दिक्कत : सुजाता

लोक कलाकार सुजाता नेगी ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा एवं संस्कृति से होती है। हमें अन्य देशों की भाषा सीखने को मिले तो यह अच्छी बात है। अगर अपनी भाषा को ही छोड़ दिया तो यह दिक्कत है। सरकार को ऐसा करना चाहिए कि हिंदी को एक दसवीं से आगे भी आवश्यक विषय के रूप में स्कूलों में पढ़ाना चाहिए। सुजाता नेगी सोलमा गीत पर लोकनृत्य और अभिनय के लिए खूब चर्चित रही हैं। 

अंग्रेजी में हिंदी से ज्यादा रोजगार के विकल्प क्यों : सुनयना

एचपीयू में हिंदी की शोधार्थी और युवा कवयित्री सुनयना शर्मा ने कहा कि आज का समय बाजारवाद का है। हिंदी हमारी भावनाओं से जुड़ी हुई भाषा है। हिंदी के व्यावहारिक पहलुओं से भी परिचित होना पड़ेगा। सर्वप्रथम हिंदी को रोजगार से जोड़ना जरूरी है। आज अंग्रेजी में हिंदी से ज्यादा रोजगार के विकल्प मौजूद हैं, ऐसा क्यों। इस बारे में सोचना होगा।

हिंदी तो हमारे जीने-मरने की भाषा : सारस्वत 

लेखक, कवि व शिक्षक राजेश सारस्वत ने कहा कि जितनी मर्जी अन्य भाषाएं पढ़ी जाएं, पर जो मातृभाषा है वे उसका स्थान नहीं ले सकतीं। हिंदी को छोड़कर युवा अंग्रेजी को स्टेटस सिंबल की तरह लेते हैं तो गलती करते हैं। हिंदी तो हमारे जीने-मरने की भाषा है। हिंदी से ही हमारा अस्तित्व है। जिस भाषा ने आजादी के समय हमारा हाथ थामा है, उसके प्रति हमारी कृतज्ञता सदैव रहनी चाहिए। 

मीडिया भी सतर्क होकर इस्तेमाल करे हिंदी भाषा : श्रीधर

सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और लेखक तरुण श्रीधर ने कहा कि आज हमारे पास ऐसी युवा पीढ़ी है, जिसे न हिंदी आती है और न ही अंग्रेजी आती है। मीडिया को भी हिंदी भाषा का इस्तेमाल करते हुए सतर्क होने की जरूरत है। आजकल वेब चैनलों में तो कई अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं। अच्छा बाल साहित्य भी नहीं लिखा जा रहा है, जिसे बच्चों को पढ़ाया जाए। सरकारी वेबसाइटें भी अंग्रेजी में ही खुलती हैं, उस स्तर पर भी काम होना चाहिए। चर्चा में सम्मिलित होने का अवसर दिया इसके लिए वह अमर उजाला का आभार जताते हैं। 

हिंद की पहचान है हिंदी : अरुण कुमार 

हिंदी के सहायक आचार्य अरुण कुमार ने कहा कि हिंदी हिंद की पहचान है और राष्ट्रीय अस्मिता और भारतीय संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन में इसका अतुलनीय योगदान है। वर्तमान में हिंदी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पर्याय बन चुकी है। वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा की बदौलत हमें जो पहचान मिली है, उसे कायम रखना हमारा नैतिक दायित्व है। 

Source link


0 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *