साइना की समीक्षा: एक और स्पोर्ट्स बायोपिक है ‘साइना’

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साइना समीक्षा: कोई जीत जते शख्स पर बायोपिक बनाना खतरे से खाली नहीं होता है। ऐसे कई लोग होते हैं जो उस शख्सियत को करीब से देखा और समझा होता है। इन लोगों को एक छोटीसी भी गलती नहीं होती है। खिलाडियों की ज़िन्दगी पर फिल्में बनाने के एपिसोड में बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल के जीवन पर परिणीति चोपड़ा द्वारा अभिनीत और अमोल गुप्ते द्वारा निर्देशित फिल्म साइना, हाल ही में फ़िल्मॉन प्राइम वीडियो – समीक्षा की गयी। इसके पहले कुछ समय के लिए यह फिल्म थिएटर्स में भी शुरू की गई थी। कोरोना की वजह से सिनेमा हॉल में देखने वाले कम थे। सचिनंदुलकर के बाद साइना नेहवाल भारत की ऐसी एथलीट हैं, जिन्होंने बच्चों को खेल में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया। साइना रोल मॉडल बनीं, यूथ आइकॉन बनीं और चैंपियन तो वह बनी ही रहीं। साइना की फैन फँसिंग अभी भी ज़बरदस्त है। जैसा हर सफल खिलाड़ी की जीवनी में होता है, माता-पिता और परिजनों का साथ और त्याग, कड़ी मेहनत, ब्रम्ह मुहूर्त से कहीं पहले उठ कर कर योग्यता निर्माण के तप में कर्मों की आहुति और गुरुजनों का आशीर्वाद। ये सब फिल्म साइना में है। जाट परिवार में एक जुझारू और लड़ाकू जीवट वाली माँ और एक कर्मठ पिता की पुत्री साइना का बैडमिंटन से प्रेम, उसकी माँ की वजह से हुआ। ज़िन्दगी ने जो भी शूट उसकी ओर से खेला, साइना की मां ने साइना को वो शॉट कैसे खेलना सिखाया गया है। उसके पिता का उसे सुबह 3 बजे उठा कर स्कूटर से 25 किलोमीटर दूर बैडमिंटन सीखने ले जाना, उसकी बहन का चुपचाप सैक्रिफाइस करते रहना, बस कुछ खास दोस्तों के साथ साइना का मुस्कानुराना और हंसना, पुलेला गोपीचंद जैसे फोकस वाले कोच के साथ बिना हार माने । बड़ी बात, बस यही है जो इस बायोपिक में है। साइना की ज़िन्दगी में जितना ड्रामा हो सकता था, वो सब इस फिल्म में डाला गया है। न कोई किस्सा बनाया गया न कोई किस्सा गढ़ा गया और न ही कोई कहानी रची गयी। साइना के क्रॉस कोर्ट स्मैश की तरह। तेज, पराक्रम और प्रभावी। यह बायोपिक में जो नहीं हुआ वह मुख्य किरदार से एक भावनात्मक सम्बन्ध नहीं बन पाना है। फिल्म अच्छी है युवाओं को पसंद आएगी, छोटे बच्चों को खेल के करियर के प्रति जागरूक करने के लिए सही है। फिल्म में साइना का संघर्ष नज़र तो आया लेकिन महसूस नहीं हुआ। दर्शकों का गला नहीं रूंधा। उसकी जीत उसकी जीत हुई लेकिन कम, उसकी हार तो बस उसी की कर रह गयी। पुलेला गोपीचंद की भूमिका में मानव कौल (राजन सर) से नफरत भी नहीं हुई और पारुपल्ली कश्यप के रोल में एहसान नकवी से मोहब्बत नहीं हो पायी। ये इस फिल्म का वीक पॉइंट है। बायोपिक हमेशा एक ड्रामेटिक स्टोरी पकड़ते हैं, इसमें मुख्य किरदार से या फिर प्यार हो जाता है या घनघोर नफरत करता है। साइना से दोनों ही नहीं मिले। कहानी निर्देशक अमोल गुप्ते ने खुद लिखी है और डायलॉग अमितोष नागपाल के हैं। फिल्मों में, विशेष रूप से बायोपिक्स में शिक्षा, नोस्टैल्जिया, शब्दावली, संघर्षों को जीतने की, कठिन परिस्थितियों से जूझ कर विजेता बनने की कहानी होती है। साइना में जो कुछ भी जितना भी है, उस से दर्शकों को इमोशनल कनेक्शन फील नहीं हुआ। साइना, साइना रिव्यू, साइना नेहवाल परिणीति चोपड़ा, अमोले गुप्ते, अमेज़ॅन प्राइम वीडियो, साइना, साइना रिव्यू, साइना नेहवाल परिणीति चोपड़ा अमोल गुप्ते, अमेजा प्राइम वीडियो
परिणीति ने ये रोल स्वीकार किया था जब श्रद्धा कपूर ने ये फिल्म करने में असमर्थता जताई थी। परिणीति का अभिनय अच्छा है। अक्खड़ अंदाज़ में भोली सी लड़की का किरदार परिणीति ने बखूबी प्लेया है। मां के किरदार में मेघना मलिक ने काफी ओवर एक्टिंग की है लेकिन साइना की माताजी की कोई सार्वजनिक अपीयरेंस देखने में नहीं आयी है इसलिए जैसे ये ड्रामा भरा किरदार जरूरी था। पिता के रोल में शुभ्रज्योति भारत और कोच नं। 2 के रूप में अंकुर विकल ने अच्छा काम किया है। फिल्म में काबिल-ए-तारीफ काम किया है नायशा कौर भटोये ने, जो बनी हैं नन्ही साइना। जायशा खुद नेशनल लेवल बैडमिंटन प्लेयर हैं और उन्हें श्रद्धा कपूर ने खोज के निकाला था। प्रदर्शन में उनका कोई भविष्य नहीं है लेकिन इस रोल के लिए इस से ठीक नहीं और कलाकारवादी मिल भी नहीं सकती थी। मानव कौल हमेशा की तरह एक बार फिर इम्प्रेस कर गए। फिल्म की कहानी से ज्यादा फिल्म का प्रोडक्शन भारी था। श्रद्धा कपूर ने फिल्म साइन करने के बाद काफी मेहनत की थी और बैडमिंटन के गुर सीखने कर साइना का अंदाज़ भी सीखना शुरू कर दिया था। एक दिन अचानक उन्होंने फिल्म छोड़ दी, अपनी तबियत का हवाला दे कर। वहीं प्रोड्यूसर्स ने बयान दिया कि श्रद्धा इस बायोपिक को प्रमुखता नहीं दे रही हैं, इसलिए परिणीति को लिया जा रहा है। परिणीति ने भी बैडमिंटन सीखने में और साइना जैसा रैकेट पकड़ना / उनके स्टैंड रहने का अंदाज़ … सब कुछ कॉपी किया। लेकिन कहानी अगर प्रेडिक्टेबल है तो आप कुछ भी करें, कोई फर्क नहीं पड़ेगा। फिल्म बनने में 5 साल लग गए। हो सकता है इस कारण से, कहानी पर काम करते निर्देशक करें भी थक गए और उन्होंने फिल्म बना ली। निर्देशन में कोई नक्शा नहीं है। तारे ज़मीन पर और स्टैनले का डब्बा जैसी फिल्मों के बाद, अमोल की साइनास्टिक करती है। फिल्म में “खिलाड़ी की सफलता में पूरे परिवार का योगदान होता है” जैसा एक सोशल मैसेज भी डाला गया जो फिल्म की कहानी में कोई प्रभावी योगदान नहीं दिखता। साइना की मां का पहले कैंप में एडमिशन के लिए लड़ना और फिर साइना के पिता का पीएफ से लोन लेकर बिटिया के सफाई के लिए बफरकॉर्ड खरीदना, बस ये दो घटनाओं के अलावा कोई बात नहीं बताई गई। फिल्म का संगीत कहानी में फिट है लेकिन कोई गाना हिट हो जाए ऐसा कहना मुश्किल है। अरमान मलिक ने संगीत की बागडोर संभाली है, और “चल रही चलें” और “परिंदा” सुनने -मज़ने में अच्छे लगते हैं। दोनों गाने मनोज मुंतशिर ने लिखे हैं।

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फिल्म प्रेडिक्टेबल है। फिल्म में कुछ नया नहीं है। फिर भी परिणीति की ज़िन्दगी के बेहतर पर प्रदर्शनों में से एक मानी होगीगी। चक दे ​​इंडिया, भाग मिल्खा भाग, पान सिंह तोमर, या मैरी कॉम जैसा कोई भावनात्मक ड्रामा इस फिल्म में नहीं है। ये फिल्म की छाप छोड़ने की क्षमता कम कर देती है। कहानी में कनफ्लिक्ट का अभाव बहुत खलता है। साइना और कश्यप की लव स्टोरी दिखाई जा सकती थी और कश्यप खुद एक चैंपियन खिलाड़ी हैं तो उनका रोल थोड़ा बढ़ा सकता था। अंक लगने के बाद साइना की रिकवरी पूरी भी बड़ी जल्दी दिखाई दी गयी है। घर पर घरवालों के साथ एक अच्छी फिल्म के तौर पर, एक यूथ आइकॉन बनने की कुकी-पक्की कहानी के तौर पर और अपने बच्चों को स्पोर्ट्स के प्रति प्रेम जगाने के उद्देश्य से यह फिल्म देखी जा सकती है।





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