नंदीग्राम की हार के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहेंगेगी ममता? जानें क्या कहता है आर्टिकल 164

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मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम से बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी से हार का सामना करना पड़ा है। (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव) में भले ही तृणमूल कांग्रेस (तृणमूल कांग्रेस) ने बीजेपी (भाजपा) को पटखनी दी हो लेकिन सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (ममता बनर्जी) नंदीग्राम (नंदीग्राम) से बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी (सुवेंदु) आदिकारी) से हार का सामना करना पड़ा है।

नई दिलवाली पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव) के नतीजों में तृणमूल कांग्रेस (तृणमूल कांग्रेस) ने बड़ी जीत हासिल की है। विधानसभा चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी (भाजपा) को पटखनी दी हो लेकिन सूबे की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी (ममता बनर्जी) को नंदीग्राम (नंदीग्राम) से हार का सामना करना पड़ा है। पश्चिम बंगाल की सबसे हॉट सीट मानी जा रही नंदीग्राम के बारे में जैसा अनुमान लगाया जा रहा था, परिणाम भी वैसा ही दिखाई दिया। शुरुआत में ये स्‍पष्‍ट ही नहीं हो पाए कि नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी की जीत हुई है या फिर ममता बनर्जी ने बाजी मारी है। बता दें कि न्‍यूज एजेंसी एएनआई ने पहले ममता बनर्जी ने जीत का दावा किया था लेकिन रविवार शाम को ममता बनर्जी ने खुद प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में अपनी हार स्‍वीकार कर ली। ये सबके बीच तृणमूल कांग्रेस के एक ट्वीट में नंदीग्राम में जीत-हार को और जियादा भ्रामक बना दिया जब पार्टी की ओर से कहा गया कि अभी मतगणना जारी है। अगर ममता बनर्जी नंदीग्राम से हार चुकी हैं तो ये सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनी रहेंगी? हालांकि चुनावी विश्‍लेशकों का कहना है कि वह निश्चित रूप से एक बार फिर पश्चिम बंगाल की बागडोर अपने हाथ में लेंगी। अगर बात करें तो भारत के तीन सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, योगी आदित्यनाथ और कोटाव ठाकरे, सभी अपने-अपने राज्यों की विधान परिषद के सदस्य हैं जबकि विधान सभा का हिस्सा नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो वे मुख्यमंत्री बनने के लिए विधानसभा चुनाव नहीं जीते हैं। इनमें से बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ही ऐसे मुख्‍यमंत्री हैं जिन्‍होंने 36 साल पहले विधानसभा चुनाव लड़ा था।

यह भी पढ़ें: – ममता को शुभकामनाएं दे बोले पीएम मोदी, कोरोना में पूरी मदद करेंगेबता दें कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री कोटव ठाकरे ने कभी आम चुनाव नहीं लड़ा है। हालांकि ममता बनर्जी के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि पश्चिम पश्चिम बंगाल में विधान परिषद नहीं है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने इस तरह के ढांचे को बनाने की बात कही है। यह भी पढ़ें: – ममता का करिश्मा, माँ-माटी-मानुष का नारा, समझिए TMC की हैट्रिक और भाजपा की हार के कारण

अनुच्छेद 164 कहता है, एक मंत्री जो लगातार छह महीने तक किसी राज्य के विधानमंडल का नहीं होता है, वह इस समय सीमा के ख्रेडम होने के बाद मंत्री नहीं बन सकता है। इसका मतलब है कि ममता बनर्जी के पास सांसद बनने के लिए 6 महीने का समय है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय महासचिव विधान नहीं है ऐसे में ममता बनर्जी को 6 महीने के अंदर किसी खाली सीट से नामांकन दाखिल करना होगा और उप-चुनाव जीतकर सांसद बनना होगा। यह भी पढ़ें: – दीदी हैं बंगाल की ‘दादा’ लेकिन नंदीग्राम की लड़ाई में शुवेंदु अधिकारी ने ममता को दी मात इस बीच, रविवार को अपनी हार पढ़वीकर करते हुए ममता बनर्जी ने कहा, मैं नंदीग्राम के फैसले को स्वीकार करता हूं। मैं संवैधानिक पीठ के पास जाऊंगी। उन्होंने कहा कि इस बार के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने एक शानदार जीत हासिल की है और बीजेपी चुनाव हार गई है। ममता ने कहा, बीजेपी ने गंदी राजनीति की, चुनाव आयोग को लक्ष्मण रेखा को जरूरत है।








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