ट्रैक्टर मार्च निकाल कर किसानों ने जाहिर किए अपने कड़े इरादे, आठवें दौर की बैठक में भी बरकरार रहेगा यही रुख

Published by Razak Mohammad on

ट्रैक्टर मार्च में भाग लेने जा रहे ट्रैक्टर
– फोटो : Amar Ujala

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केंद्र सरकार के साथ किसानों की आठवें दौर की बातचीत शुक्रवार आठ जनवरी को दिल्ली के विज्ञान भवन में होगी। इसके ठीक एक दिन पहले अपनी मांगों के समर्थन में ट्रैक्टर मार्च निकालकर किसानों ने यह घोषणा कर दी है कि वे अपनी मांगों पर बरकरार रहेंगे और तीनों कृषि कानूनों की वापसी के अलावा वे किसी अन्य मुद्दे पर बातचीत नहीं करेगे। किसानों ने कहा है कि अगर आठवें दौर की वार्ता में सरकार कृषि कानूनों को वापस लेने पर सहमत नहीं होती है तो 26 जनवरी को इसी तरह का ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और लालकिला मैदान तक परेड करते हुए जाएंगे।

लोक संघर्ष मोर्चा की अध्यक्ष किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने अमर उजाला को बताया कि गुरुवार को आयोजित किया गया ट्रैक्टर मार्च केवल एक ‘मिलन कार्यक्रम’ था। पिछले 43 दिन से सभी किसान नेता दिल्ली के अलग-अलग मोर्चों पर डटे हुए हैं, लेकिन प्रमुख नेताओं के अलावा बाकी लोग आपस में मिलजुल नहीं पा रहे हैं। इस मार्च के जरिए किसानों ने एक-दूसरी जगह पर पहुंचकर अपने अन्य किसान साथियों से मुलाकात की। गुरुवार शाम को एक बैठक के जरिए आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

नजर आया गणतंत्र दिवस परेड के जैसा जोश

ट्रैक्टर मार्च के दौरान किसान नेता उसी तरह पूरी तैयारी और जोश से लबरेज दिखाई पड़े, जैसे 15 अगस्त या 26 जनवरी के कार्यक्रमों के दौरान लोग दिखाई पड़ते हैं। उत्तराखंड के किसान नेता विजयपाल ने कहा, यह हमारे लिए आजादी के दिवस जैसा ही है। अगर हम इन कानूनों का विरोध नहीं करते हैं तो इसके जरिए लोग कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जाल में फंस जाएंगे। इसमें पहले तो शायद उन्हें लाभ हो, लेकिन जल्दी ही यह उनके लिए गुलामी में बदल जायेगा क्योंकि इससे उन्हें अपने ही खेतों पर अधिकार नहीं रह जाएगा। उन्होंने कहा कि यह हमारी गुलामी के विरुद्ध आजादी की लड़ाई है।

कच्छ जाते हैं, यूपी बॉर्डर क्यों नहीं आते

किसानों का सारा गुस्सा प्रधानमंत्री के रूख को लेकर है। किसानों के बीच इस बात की भारी नाराजगी है कि वे यहां 43 दिनों से डटे हुए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज तक उनसे मिलने तक नहीं आए। जबकि इसी दौरान वे कभी कच्छ के किसानों से बात कर रहे हैं तो कभी मध्यप्रदेश के किसानों से बात कर रहे हैं। किसानों ने कहा कि प्रधानमंत्री को नकली किसानों से मिलने का नाटक नहीं करना चाहिए और यहां बॉर्डर पर आकर असली किसानों से मिलकर उनकी समस्याएं सुलझानी चाहिए।

किसानों ने कहा कि अगर सरकार जल्दी उनकी समस्याओं का हल नहीं निकालती है तो वे यहां अगले आम चुनाव तक डटे रहेंगे और इस सरकार को गिराकर ही वापस जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों की ताकत हल्के में नहीं आंकनी चाहिए।

आंदोलन की खबर जानने के लिए जारी है अपना चैनल

किसान नेताओं ने अपने ट्रैक्टर मार्च की जानकारी बाकी सभी साथियों तक पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को जरिया बनाया हुआ है। वे फेसबुक लाइव के जरिए मार्च की पूरी जानकारी दूसरे साथियों तक पहुंचा रहे हैं। पंजाब के कुछ वेब चैनल इस परेड प्रैक्टिस की पूरी कवरेज दिखा रहे हैं। ट्रैक्टर की ट्रालियों में किसानों ने टीवी सेट्स लगा दिए हैं जहां से वे पूरे आंदोलन पर नजर रखे हुए हैं।

जलेबी खिलाकर कर रहे लोगों का स्वागत

किसान नेताओं ने कहा कि आजादी के कार्यक्रम में पूरी जनता को खुशी होती है। इस दिन परेड निकाली जाती है और लोगों का मुंह मीठा कराया जाता है। इसी क्रम में गुरुवार को यूपी गेट पर कई जगह पर जलेबियां बनाई जा रही थीं और हर आने-जाने वालों को किसान जलेबी खिलाकर स्वागत कर रहे थे। किसानों ने कहा कि आर्थिक आजादी के इस आंदोलन में वे सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं और चाहते हैं कि इस आंदोलन का ऐसा हल निकले जिससे किसी पक्ष को कोई तकलीफ न हो।

मीडिया में छप रही खबरों पर नजर

यूपी गेट पर एक स्थान पर टेंट के अंदर पुस्तकालय टाइप की सुविधा बना दी गई है जहां आने-जाने वाला हर किसान नेता लगभग हर समाचार पत्र पढ़ रहा है। उत्तराखंड के किसान नेता अजित कुमार ने कहा कि वे अखबारों में छपी खबरों पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं। इन किसान नेताओं की शिकायत है कि मुख्य धारा का मीडिया उनकी बात सही से नहीं उठा रहा है और खबरों को पेश करने के मामले में पक्षपात किया जा रहा है। मेरठ के किसान नेता रंजीत कुमार ने कहा कि मीडिया सरकार के भारी दबाव में है और वे चाहकर भी हमारी पूरी बातें सामने नहीं रख रहे हैं।

किसान नेता इसके पहले ही 13 जनवरी को लोहड़ी के दिन कृषि कानूनों की प्रतियां जलाने, 18 जनवरी को महिला किसानों के सम्मान में विशेष दिवस मनाने, 23 जनवरी को सुभाष चंद्र बोस जयंती पर विशेष सम्मान कार्यक्रम आयोजित करने और 26 जनवरी को लालकिला तक ट्रैक्टर मार्च निकालने की रणनीति बना चुके हैं। अगले 15 दिनों तक राज्यों की राजधानियों में पहुचकर किसान राजभवनों पर भी प्रदर्शन करेंगे और राज्यपालों को अपनी मांगों से अवगत कराएंगे।

सार

आठ जनवरी को केंद्र-किसानों के बीच होनी है आठवें दौर की वार्ता, किसानों ने कहा- तीनों कानूनों की वापसी के अलावा नहीं होगी कोई और बातचीत…

विस्तार

केंद्र सरकार के साथ किसानों की आठवें दौर की बातचीत शुक्रवार आठ जनवरी को दिल्ली के विज्ञान भवन में होगी। इसके ठीक एक दिन पहले अपनी मांगों के समर्थन में ट्रैक्टर मार्च निकालकर किसानों ने यह घोषणा कर दी है कि वे अपनी मांगों पर बरकरार रहेंगे और तीनों कृषि कानूनों की वापसी के अलावा वे किसी अन्य मुद्दे पर बातचीत नहीं करेगे। किसानों ने कहा है कि अगर आठवें दौर की वार्ता में सरकार कृषि कानूनों को वापस लेने पर सहमत नहीं होती है तो 26 जनवरी को इसी तरह का ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और लालकिला मैदान तक परेड करते हुए जाएंगे।

लोक संघर्ष मोर्चा की अध्यक्ष किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने अमर उजाला को बताया कि गुरुवार को आयोजित किया गया ट्रैक्टर मार्च केवल एक ‘मिलन कार्यक्रम’ था। पिछले 43 दिन से सभी किसान नेता दिल्ली के अलग-अलग मोर्चों पर डटे हुए हैं, लेकिन प्रमुख नेताओं के अलावा बाकी लोग आपस में मिलजुल नहीं पा रहे हैं। इस मार्च के जरिए किसानों ने एक-दूसरी जगह पर पहुंचकर अपने अन्य किसान साथियों से मुलाकात की। गुरुवार शाम को एक बैठक के जरिए आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा।

नजर आया गणतंत्र दिवस परेड के जैसा जोश

ट्रैक्टर मार्च के दौरान किसान नेता उसी तरह पूरी तैयारी और जोश से लबरेज दिखाई पड़े, जैसे 15 अगस्त या 26 जनवरी के कार्यक्रमों के दौरान लोग दिखाई पड़ते हैं। उत्तराखंड के किसान नेता विजयपाल ने कहा, यह हमारे लिए आजादी के दिवस जैसा ही है। अगर हम इन कानूनों का विरोध नहीं करते हैं तो इसके जरिए लोग कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जाल में फंस जाएंगे। इसमें पहले तो शायद उन्हें लाभ हो, लेकिन जल्दी ही यह उनके लिए गुलामी में बदल जायेगा क्योंकि इससे उन्हें अपने ही खेतों पर अधिकार नहीं रह जाएगा। उन्होंने कहा कि यह हमारी गुलामी के विरुद्ध आजादी की लड़ाई है।

कच्छ जाते हैं, यूपी बॉर्डर क्यों नहीं आते

किसानों का सारा गुस्सा प्रधानमंत्री के रूख को लेकर है। किसानों के बीच इस बात की भारी नाराजगी है कि वे यहां 43 दिनों से डटे हुए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज तक उनसे मिलने तक नहीं आए। जबकि इसी दौरान वे कभी कच्छ के किसानों से बात कर रहे हैं तो कभी मध्यप्रदेश के किसानों से बात कर रहे हैं। किसानों ने कहा कि प्रधानमंत्री को नकली किसानों से मिलने का नाटक नहीं करना चाहिए और यहां बॉर्डर पर आकर असली किसानों से मिलकर उनकी समस्याएं सुलझानी चाहिए।

किसानों ने कहा कि अगर सरकार जल्दी उनकी समस्याओं का हल नहीं निकालती है तो वे यहां अगले आम चुनाव तक डटे रहेंगे और इस सरकार को गिराकर ही वापस जाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार को किसानों की ताकत हल्के में नहीं आंकनी चाहिए।

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