चीन-भारत संबंधों के लिए जरूरी है बहुध्रुवीयता और परस्पर व्यवहार का स्वीकारा जाना: जयशंकर

Published by Razak Mohammad on


न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

Updated Mon, 14 Sep 2020 12:41 AM IST

विदेश मंत्री एस जयशंकर (फाइल फोटो)
– फोटो : PTI

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि चीन और भारत के बीच ज्यादा व्यवस्थित और मजबूत संबंधों के लिए दोनों देशों द्वारा बहुध्रुवीयता और परस्पर व्यवहार की व्यापक स्वीकृति महत्वपूर्ण है। यह वैश्विक पुनर्संतुलन के व्यापक बुनियाद पर बनाई जानी चाहिए।

विदेशमंत्री ने अपनी किताब में कहा, सभी देश बातचीत के नियम और शर्तों को अपने हिसाब से कर रहे तय

हाल ही में जारी अपनी किताब ‘द इंडिया वे: स्ट्रेटेजीज फॉर ए अनर्सेटेन वर्ल्ड’ में उन्होंने कहा है कि भारत ही सिर्फ इकलौता देश नहीं है, जो चीन के साथ संबंध पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। पूरी दुनिया ऐसा कर रही है और हर देश बातचीत के नियम और शर्तों को अपने हिसाब से फिर से तय कर रहे हैं।

मई में पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सैन्य गतिरोध से पहले लिखी इस पुस्तक में जयशंकर ने लिखा है, यदि सामान्य दृष्टिकोण है तो आंतरिक रूप से क्षमताओं को मजबूत करने और बाहरी परिदृश्य का आकलन करते हुए चीन के साथ समझ बनाई जा सकती है। इस पूरी कवायद में भारत अपने आकार, स्थान, क्षमता, इतिहास और संस्कृति के आधार पर एक विशेष स्थान हासिल कर लेगा।

पटेल और नेहरू के बाद बहुत कुछ बदला

विदेश मंत्री के अनुसार, नवंबर 1950 में सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू द्वारा चीन से तालमेल बिठाने तरीके पर विचार-विमर्श किए जाने के बाद से बहुत कुछ बदल गया है। उन्होंने कहा, विश्व की घटनाएं न केवल चीन के समग्र रवैये, बल्कि भारत के प्रति उसके विशिष्ट व्यवहार को निर्धारित करती हैं।

फिलहाल, भारत के लिए जरूरी है कि वह इस बदलाव पर लगातार नजर रखे। भारत के लिए चीन के साथ उसके संबंध और पश्चिमी देशों के साथ उसकी साझेदारी एक महत्वपूर्ण तत्व होगा। रूस के साथ नयी संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि चीन और भारत के बीच ज्यादा व्यवस्थित और मजबूत संबंधों के लिए दोनों देशों द्वारा बहुध्रुवीयता और परस्पर व्यवहार की व्यापक स्वीकृति महत्वपूर्ण है। यह वैश्विक पुनर्संतुलन के व्यापक बुनियाद पर बनाई जानी चाहिए।

विदेशमंत्री ने अपनी किताब में कहा, सभी देश बातचीत के नियम और शर्तों को अपने हिसाब से कर रहे तय

हाल ही में जारी अपनी किताब ‘द इंडिया वे: स्ट्रेटेजीज फॉर ए अनर्सेटेन वर्ल्ड’ में उन्होंने कहा है कि भारत ही सिर्फ इकलौता देश नहीं है, जो चीन के साथ संबंध पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। पूरी दुनिया ऐसा कर रही है और हर देश बातचीत के नियम और शर्तों को अपने हिसाब से फिर से तय कर रहे हैं।

मई में पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सैन्य गतिरोध से पहले लिखी इस पुस्तक में जयशंकर ने लिखा है, यदि सामान्य दृष्टिकोण है तो आंतरिक रूप से क्षमताओं को मजबूत करने और बाहरी परिदृश्य का आकलन करते हुए चीन के साथ समझ बनाई जा सकती है। इस पूरी कवायद में भारत अपने आकार, स्थान, क्षमता, इतिहास और संस्कृति के आधार पर एक विशेष स्थान हासिल कर लेगा।

पटेल और नेहरू के बाद बहुत कुछ बदला

विदेश मंत्री के अनुसार, नवंबर 1950 में सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू द्वारा चीन से तालमेल बिठाने तरीके पर विचार-विमर्श किए जाने के बाद से बहुत कुछ बदल गया है। उन्होंने कहा, विश्व की घटनाएं न केवल चीन के समग्र रवैये, बल्कि भारत के प्रति उसके विशिष्ट व्यवहार को निर्धारित करती हैं।

फिलहाल, भारत के लिए जरूरी है कि वह इस बदलाव पर लगातार नजर रखे। भारत के लिए चीन के साथ उसके संबंध और पश्चिमी देशों के साथ उसकी साझेदारी एक महत्वपूर्ण तत्व होगा। रूस के साथ नयी संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।



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